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bafar zone TIGER

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DNA LEKH

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डेली न्यूज़ एक्टीविस्ट लखनऊ
में पेज आठ पर छपा लेख 30.07.2012

More than 400 tigers have been missing the last five years

More than 400 tigers have been missing the last five years
Has half the number of tigers in India
Latest figures issued by the Government of India’s tigers, whose numbers have halved the tiger.

Secretary of the National Tiger Conservation Authority Rajesh Gopal said, “The number of tigers in the 2002 survey was 3500 but the latest survey estimated 1411 tigers left in India.”

The government says that the figures were not correct.

Rajesh Gopal said that the new method was adopted for the number of tigers. Based on previous footprints which was used to determine the number of defaults was Gujanis.

Concern over dwindling

In Madhya Pradesh, the highest number is 300. In Uttarakhand, 178, 109 in Uttar Pradesh and Bihar are estimated to be 10 tigers.

95 Similarly, in Andhra Pradesh, Chhattisgarh, 26, 103 in Maharashtra, 45 in Orissa and Rajasthan have been assessed to be 32 tigers
Earlier, Prime Minister Manmohan Singh expressed concern over declining numbers of tigers and said that efforts to reduce population pressure on forests.The Tigers had set up a working group for the Indian government and environmentalist Sunita Narain, the head was made.
Is believed that
Notably, 40 percent of the world’s tigers live in India.

Wildlife is ruining the river Suheli

Wildlife is ruining the river Suheli
Dudhwa National Park and the banks of the river flowing ever approximate the Suheli
Prandayini were animals by giving them water. But Suheli Silting and natural change the river’s wildlife has become an enemy.Silting from the hundreds of acres of lush pastures of the desert is dry and the lower parts is reduced. Most side effects it has on the life cycle is Barhsingon while looking for other places to visit villages where they do not mind the village’s illegal to hunt. There is a steady decline in the number of wild animals. Government Administration respectively Suheli River cleanup – excavation has been spending money on the millions who were lost to Bandrbat contractors and officials. The result has turned out to be zero.Suheli river nearby forest and wildlife as a result of the destruction of rural areas has become due. The park administration officials responsible for the Deaf – the Suheli Bgir Binash watching a river.
Due to their destruction is becoming now. In addition Gramimancl also adjacent to the river again and again the tragedy of floods are on the verge of clearing waste.
Suheli The river flows from Nepal with rain water in the soil – sand comes. The deposition (Silting) has diminished due to the depth of the river around the Silting in the lower areas as they have been higher. Due to its nearest Nkuha seamless stream of water is not able to get. Consequently, the river has made a new channel PP sewer, culvert, drain the love in which the water was Suheli She also began to return
Is. Nkuha PWD road to the bridge on either side of the bridge Suheli Suheli Nkuha river water stream coming from the fast pace.But by the PWD are efforts being made to prevent erosion.Dudhwa road in the near future to widen the reduction of the trace is over 45 towns of the region including Nepal Tharu tribal nations can cut us to Dudhwa. Significantly, the natural changes in river Suheli also on the side nearest Graminancl starts. When a rain Ufnai Suheli river and surrounding countryside is filled in the fields is the most damage to crops. And rural, also again and again are forced to face the tragedy of floods.

Will the new identity of Dudhwa rhinos

Dudhwa National Park rhinoceros family of three members, each member will soon find his identity ID number or name. Will be placed in the computer database record of the rhinoceros. This will happen to the rhino monitoring. Dudhwa administration’s proposal by the plan is sent to the government. ID-based monitoring program will be conducted to study the Deputy Director of the Dudhwa Tiger Reserve will soon visit Nepal, Chitwan National Park.
Dudhwa National Park is successfully running the world’s unique rhinoceros rehabilitation project. Variance wayward rhinoceros family member is currently thirty-one. But maintenance is very difficult to even get the location. Although elephants have been monitoring the rhinos. For monitoring and location Dudhwa rhinos rhinos Aidivesd Administration made monitoring program. The proposal has been forwarded to the Government. If everything was all right to come here in some time to identify all of the rhinos will be given ID numbers or names.will. According to experts, the size of each rhinoceros horn and shoulders with different kinds of photos will be stored in the computer. Aibesd Nepal’s Chitwan National Park is monitoring program because Ganesh Bhatt, Deputy Director, Dudhwa Tiger Reserve in Nepal to study the program will be soon.

दुधवा के लिए सुहेली बनी अभिशाप


दुधवा नेशनल पार्क मध्य तथा किनारे प्रवाहित होने वाली सुहेली नदी कभी अपने समीपवर्ती वन्यजीवों को पानी देकर उनकी प्राणदायिनी होती थी। लेकिन सिलटिंग और प्राकृतिक परिवर्तन के चलते अब उनके विनाश का कारण बनती जा रही है। इसके अतिरिक्त नदी से सटा ग्रामीमाचल भी इसमें बार-बार आने वाली बाढ़ की त्रासदी झेलकर बर्बादी की कगार पर पहुंच गया है। उल्लेखनीय है कि नेपाल से निकली सुहेली नदी वर्षा में पानी के साथ मिट्टी- बालू साथ लाती है। इसका जमाव ( सिलटिंग) होने के कारण नदी के गहराई कम हो गई इससे आसपास के निचले भूभागों में भी सिलटिंग होने से वे ऊंचे हो गए है। इसके कारण कभी समीपवर्ती नकउहा नाला का पानी निर्वाध रूप से नहीं निकल पा रहा है। परिणाम स्वरूप नदी ने नया चैनल पीपी नाला बना दिया है, साथ ही प्रेम पुलिया नाला से जो पानी सुहेली में जाता था उसकी भी वापसी होने लगी है। इस तरह नकउहा पुल से सुहेली पुल तक पीडब्लूडी रोड के दोनों तरफ से सुहेली नदी का पानी नकउहा नाला में तेज
गति से आ रहा है। इसके कारण पीपी नाला द्वारा किए जाने वाले कटान की चपेट में जहां जंगल आ रहा है वहीं दुधवा रोड के किनारों का कटान भी हो रहा है इससे कई स्थानों पर पीपी नाला के कटान का खतरा सड़क पर बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन पीडब्लूडी द्वारा कटान की रोकथाम के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। कटान का दायरा बढ़ता गया तो निकट भविष्य में दुधवा रोड का नामोनिशान खत्म हो जाएगा तब नेपाल सहित आदिवासी जाति थारू क्षेत्र के 45 गांवों समेत दुधवाका सम्पर्क कट सकता है।
सुहेली नदी में हुए इस प्राकृतिक परिवर्तन का दुष्प्रभाव समीपवर्ती ग्रामीणांचल पर भी पड़ने लगता है। थोड़ी वर्षा होते ही उफनाई सुहेली नदी का पानी आसपास के गांवों एवं खेतों में भर जाता है जिसमें सर्वाधिक नुकसान फसलों को को होता है। तथा ग्रामीण भी बार-बार आने वाली बाढ़ की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं। इसके अगर नजरअंदाज भी कर दिया जाए तो सुहेली नदी अब वन्यजीवों की दुश्मन बन गई है। इससे होने वाली सिलटिंग से सैकड़ों एकड़ हरा भरा जंगल सूख गया है तथा निचले भागों के चारागाह सिमट गए है। इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बारहसिंघों के जीवन चक्र पर पड़ने लगा है जबकि अन्य स्थानों की तलाश में गांवों की ओर आते हैं जहां उनका अवैध शिकार करने से ग्रामीण परहेज नहीं करते है। इससे वन्यजीवों की संख्या में लगातार गिरावट आने लगी है। यद्यापि शासन प्रशासन द्वारा सुहेली नदी की सफाई खुदाई करोड़ों रूपया खर्च किया जा चुका है जो आपसी बदरबात की भेंट चढ़ गया है जिसके कारण नतीजा शून्य ही निकला है। परिणाम स्वरूप सुहेली नदी अब समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र जंगल एवं वन्यजीवों के विनाश का कारण बनने लगी है।

ऐसे तो हमारी अमूल्य राष्ट्रीय प्राकृतिक संपदा ही नष्ट हो जायेगी !

ग्रीष्मकाल शुरू होते ही गावों में ही नहीं प्रदेश के जंगलों में आग लगने का दौर शुरू हो जाता है। आग द्वारा मचाई जाने वाली तबाही एवं बर्वादी से हजारों लोग बेघर होकर खुले आसमान के नीचे जीवन गुजारने को बिवश हो जाते हैं। सरकार द्वारा प्रतिवर्ष अग्निपीड़ितों को करोड़ो रुपए का मुआवजा तो दे दिया जाता है। परंतु आग रोकने या उसके त्वरित नियंत्रण की व्यवस्था करने में आजादी के बाद अब तक रहीं प्रदेश की सरकारें असफल रहीं हैं। इसी तरह जंगलों में लगने वाली आग अकूत वन संपदा को स्वाहा कर देती है और इसकी बिनाशलीला से वन्यजीवन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रतिवर्ष आग अपना इतिहास दोहराकर नुकसान के आंकड़ों को बढ़ा देती है। प्रदेश की सरकार ज्रंगलों को भी आग से बचाने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठा रही है। यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के जंगलों में बार-बार होने वाली दावाग्नि को रोकने के लिए समुचित आधुनिक साधनों और संसाधनों की भारी कमी है। इससे लगातार लगने वाली आग से दुधवा के जंगल का न सिर्फ पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ा रहा है, बल्कि जैव-विविधता के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो गया है। दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन द्वारा जंगल में दावाग्नि नियंत्रण की तमाम ब्यवस्थाएं फायर सीजन से पूर्व की जाती हैं। अगर आग को रोकने के लिए कराए जाने वाले कार्यो को पूरी निष्ठा व ईमानदारी से कराया जाए तो आग को विकराल होने से पहले उस पर नियंत्रण हो सकता है। किंतु निज स्वार्थों में कराए गए दावाग्नि नियंत्रण के कार्य एवं सभी तैयारियां फायर सीजन यानी माह फरवरी से 15 जून के मध्य में आए दिन जंगल में लगने वाली आग का रूप जब भी बिकराल होता है तब वह मात्र कागजी साबित होती हैं।

यह बात अपनी जगह ठीक है कि जंगल में कई कारणों से आग लगती है या फिर लगााई जाती है। इसमें समयबद्ध एवं नियंत्रित आग विकास है किंतु अनियंत्रित आग विनाशकारी होती है। दुधवा के जंगल में ग्रासलैंड मैनेजमेंट एवं वन प्रवंधन के लिए नियंत्रित आग लगाई जाती है। इसके अतिरिक्त शरारती तत्वों अथवा ग्रामीणजनों द्वारा सुलगती बीड़ी को जंगल में छोड़ देना आग का कारण बन जाता है। जबकि वंयजीवों के शिकारी भी पत्तों से आवाज उत्पन्न न हो इसलिए जंगल में आग लगा देते हैं। दुधवा नेशनल पार्क के वनक्षेत्र की सीमाएं नेपाल से सटी हैं और इसके चारों तरफ मानव बस्तियां आबाद हैं। इसके चलते जंगल में अनियंत्रित आग लगने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। इसका भी प्रमुख कारण है कि नई घास उगाने के लिए मवेशी पालक ग्रामीण जंगल में आग लगा देते हैं जो अपूर्ण ब्यवस्थाओं के कारण अकसर विकाराल रूप धारण करके जंगल की बहुमूल्य वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचाती है तथा वनस्पितियों एवं जमीन पर रेंगने वाले जीव-जंतुओं को जलाकर भस्म बना देती है। विगत के दो वर्षों में कम वर्षा होने के बाद भी बाढ़ की विभीषिका के कहर का असर वनक्षेत्र पर ब्यापक रूप से पड़ा है। बाढ़ के पानी के साथ आई मिट्टी-बालू इत्यादि की हुई सिलटिंग से जंगल के अन्दर तालाबों, झीलों, भगहरों की गहराई कम हो गई है। स्थिति यह है कि जिनमें पूरे साल भरा रहने वाला पानी वंयजीवों-जंतुओ को जीवन प्रदान करता था वह प्राकृतिक जलश्रोत अभी से ही सूखने लगे हैं। इसके कारण जंगल में नमी की मात्रा कम होने से कार्बनिक पदार्थ और अधिक ज्वलनशील हो गए हैं। जिसमें आग की एक चिंगारी सैकड़ों एकड़ वनक्षेत्र का जलाकर राख कर देती है।

सन् 2001 से 2007 तक दुधवा के जंगलों में आग लगने के कारणों का अध्ययन एवं विश्लेषण दुधवा पार्क के एक उपप्रभागीय वनाधिकारी द्वारा किया गया था। जिसके अनुसार सन् 2001-02 में औसत वर्षा होने के कारण जंगल में आग लगने की घटनाएं अधिक रहीं किंतु नुकसान कम हुआ। सन् 2003-04 में अधिक वर्षा होने के कारण आग से जलने के लिए आवश्यक कार्वनिक पदार्थों में नमी की अधिकता रही जिससे आग लगने की हुई 36 घटनाओं में 16.76 हेक्टेयर वनक्षेत्र प्रभावित हुआ। जबकि सन् 2005 से 2007 के मध्य कम वर्षा के कारण कार्बनिक पदार्थों की नमी कम रही और आग लगने की होने वाली 36 घटनाओं में दावाग्नि का क्षेत्रफल एक हेक्टेयर अधिक रहा था। बल्कि सन् 2008-09 में कम वर्षा के कारण दावाग्नि की हुई घटनाओं में प्रभावित क्षेत्रफल बढ़ने से जंगल को भारी क्षति पहुंची। इस साल भी जंगल में आग लगने का सिलसिला जारी है। इससे हरे-भरे जंगल की जमीन पर दूर तक राख ही राख दिखाई देती है। लगातार लगने आग से जंगल में कई प्रजातियों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित आग बड़ी मात्रा में कार्बन डाईआक्साइड और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करके ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रही हैं और इससे जंगल की जैव-विविधता के अस्तित्व पर भी खतरा खड़ा हो जाता है।

886 वर्ग किलोमीटर में फैले दुधवा के जंगल में आग नियंत्रण के लिए फायर लाईन बनाई जाती हैं तथा आग लगने का तुरंत पता लग जाए इसके लिए तमाम संवेदनसील स्थानों पर वाच टावर स्थापित किए गए हैं। किंतु आग लगने पर उसके नियंत्रण हेतु तुरंत मौके पर पहुंचने के लिए रेंज कार्यालय या फारेस्ट चौकी पर वाहन नहीं हैं ऐसी स्थिति में कर्मचारी जब तक सायकिलों से या दौड़कर वहां पहुंचते हैं तब तक आग जंगल को राख में बदल चुकी होती है। जंगल के समीपवर्ती ग्रामीण भी अब आग को बुझाने में वन कर्मचारियों को इसलिए सहयोग नहीं देते हैं क्योंकि 1977 में क्षेत्र के जंगल को दुधवा नेशनल पार्क बना दिया गया। इसके बाद पार्क कानूनों के अंतर्गत आसपास के सैकड़ों गावों को पूर्व में वन उपज आदि की मिलने वाली सभी सुविधाओं पर प्रतिवंध लगा दिया गया है। जबकि इससे पहले आग लगते ही गावों के सभी लोग एकजुट होकर उसे बुझाने के लिए दौड़ पड़ते थे। इस बेगार के बदले में उनको जंगल से घर बनाने के लिए खागर, घास-फूस, नरकुल, रंगोई, बांस, बल्ली आदि के साथ खाना पकाने के लिए गिरी पड़ी अनुपयोगी सुखी जलौनी लकड़ी एवं अन्य कई प्रकार की वन उपज का लाभ मिल जाया करता था। लेकिन बदलते समय के साथ अधिकारियों का अपने अधीनस्थों के प्रति व्यवहार में बदलाव आया तो कर्मचारियो में भी परिवर्तन आता चला गया। स्थिति यह हो गई है कि कर्मचारी वन उपज की सुविधा देने के नाम पर ग्रामीणों का आर्थिक शोषण करने के साथ ही उनका उत्पीड़न करने से भी परहेज नहीं करते हैं। जिससे अब ग्रामीणों का जंगल के प्रति पूर्व में रहने वाला भावात्मक लगाव खत्म हो गया है। उधर आग लगने की सूचना पर पार्क अधिकारियों का मौके पर न पहुंचना और अधीनस्थों को निर्देश देकर कर्तव्य से इतिश्री कर लेना यह उनकी कार्यप्रणाली बन गई है। इससे हतोत्साहित कर्मचारियों में खासा असंतोष है और वे भी अब आग को बुझाने में कोई खास रूचि नहीं लेते है। जिससे जंगल को आग से बचाने का कार्य और भी दुष्कर होता जा रहा है। परिणाम दुधवा के जंगलों में लग रही अनियंत्रित आग वंयजीवों और वन संपदा को भारी क्षति पहुंचा रही है। पार्क के उच्च यह स्वीकार करते हैं कि आग लगने की बढ़ रही घटनाओं का एक प्रमुख कारण है कि स्थानीय लोगों के बीच संवाद का न होना है। वह यह भी मानते हैं कि वित्तीय संकट, कर्मचारियों की कमी, निगरानी तंत्र में आधुनिक तकनीकियों का अभाव, अग्नि नियंत्रण की पुरानी पद्धति आदि ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से जंगल की आग को रोकने की दिशा में प्रभावशाली कदम नहीं उठाए जा पा रहे हैं। http://dpmishra.blogspot,com

दुधवा के बाघों पर खतरा मंडराया

दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर एवं डिप्टी डायरेक्टर ने विगत दिनों अखबारों में यह बयानबाजी करके कि दुधवा और कतर्नियाघाट में बाघों का कुनुबा बढ़ा है, अपनी पीठ स्वयं थपथपाई है। उन्होंने तो यहां तक दावा कर दिया है कि दुधवा और कतर्नियाघाट के जंगल में 38 बाघ शावक देखे गये हैं। वैसे अगर देखा जाए तो यह अच्छी और उत्साहजनक खबर है। परंतु इसके दूसरे पहलू में उनकी इस बयानबाजी से बाघों के जीवन पर खतरे की तलवार भी लटक गई है।
भारत में बाघों की दुनिया सिमट कर 1411 पर टिक गई है। इसका प्रमुख कारण रहा विश्व बाजार में बाघ के अंगों की बढ़ती मांग। इसको पूरा करने के लिये सक्रिय हुये तस्करों ने बाघ के अवैध शिकार को बढ़ावा दिया। जिससे राजस्थान का सारिस्का नेशनल पार्क बाघ विहीन हो गया तथा देश के अंय राष्ट्रीय उद्यानों के बाघों पर तस्करों एवं शिकारियों की गिद्ध दृष्टि जमी हुई है। जिससे बाघों का जीवन सकंट में है। ऐसे में दुधवा टाइगर रिजर्व के जिम्मेदार दोनों अधिकारियों का उक्त बयान शिकारियों के लिये बरदान बन कर यहां के बाघ शावकों का जीवन संकट में यूं डाल सकता है क्योंकि अब जो लोग यह बात नहीं जानते थे वह भी इस बात को जान गए हैं । इससे यहां के बाघों के जीवन पर खतरे की तलवार भी लटक गई है। इस स्थिति में साधन एवं संसाधनों की किल्लत से जूझ रहा लखीमपुर-खीरी का वन विभाग क्या शिकारियों के सुनियोजित नेटवर्क का सामना कर पाएगा? यह स्वयं में विचरणीय प्रश्न है। कतर्नियाघाट वंयजीव प्रभाग क्षेत्र में अभी पिछलें माह ही लगभग आधा दर्जन गुलदारों (तेदुआं) की अस्वाभाविक मौतें हो चुकी हंै। यह घटनाएं स्वयं में दर्शाती है कि कतर्नियाघाट क्षेत्र में गुलदारों की संख्या अधिक है। इस परिपेक्ष्य में वंयजीव विशेषज्ञों का मानना है कि गुलदारों की बढ़ोत्तरी दर्शाती है कि बाघों की संख्या कम हुई है। उनका कहना है कि एक ही प्रजाति का होने के बाद भी बाघ और गुलदार के बीच जानी दुश्मनी होती है, जिस इलाकें में बाघ होगा उसमें गुलदार नहीं रह सकता है। यही कारण है कि बाघ घने जंगल में रहता है और गुलदार जंगल के किनारे और वस्तियों के आसपास रहना पंसद करता है।
दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर का इतिहास देखा जाए तो उसकी असफलता इस बात से ही जगजाहिर हो जाती है कि पिछले एक दशक में यहां बाघों की संख्या 100-106 और 110 के आसपास ही घूम रही है। दुधवा में बाघों की मानिटरिेंग की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है फिर बाघ शावकों की सही गिनती कहां से आ गयी? वैसे भी यहां बाघों की संख्या पर भी प्रश्नचिन्हृ लगते रहे हैं। ऐसी दशा में उपरोक्त अधिकारियों की बयानजाबी पर संदेह होना लाजमी है। (लेखक वाइल्डलाइफर/पत्रकार है ं)